कंपनियों के लिए मुसीबत बनी कानूनी लड़ाई:38 साल पुराने मिलावटी हल्दी मामले ने खोली ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की पोल, मुकदमों पर हर साल 26 हजार करोड़ खर्च करती हैं कंपनियां

 

  • न्याय में देरी के कारण भारत में कारोबार करना नहीं चाहती हैं विदेशी कंपनियां
  • कई बड़े कारोबारी और कॉरपोरेट सौदे मुकदमों के कारण वर्षों से अटके पड़े हैं
  • लंबी लड़ाई के कारण भारत में कंपनियों का कानूनी खर्च पांच साल में 57% बढ़ा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक कंपनियों और निवेशकों को यह समझाने के लिए उत्सुक हैं कि चीन के मुकाबले भारत ज्यादा कारोबारी फ्रैंडली देश है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के मिलावट हल्दी मामले के फैसले ने देश में कारोबारी हालातों की दूसरी तस्वीर पेश की है। यह फैसला देश में न्यायिक देरी को उजागर करता है। यह न्यायिक देरी कारोबार और कारोबारी सौदों में गतिरोध पैदा करती है।

ये है मिलावटी हल्दी मामला

18 अगस्त 1982 को हरियाणा निवासी प्रेमचन्द ने 100 ग्राम हल्दी बेची थी। हल्दी खरीदने वाला यह ग्राहक खाद्य विभाग का कर्मचारी था। हल्दी की जांच हुई और आरोप लगाया गया कि उसमें कीड़े पाए गए हैं। निचली अदालत में 14 साल मुकदमा चला और प्रेमचंद बरी हो गई। निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सरकार पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट चली गई। हाईकोर्ट ने 11 साल बाद 9 दिसंबर 2009 को प्रेमचंद को हल्दी में मिलावट का दोषी ठहराते हुए उसे 6 महीने की कैद की सजा और दो हजार रुपए का जुर्माना लगाया। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रेमचंद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने करीब साढ़े 9 साल सुनवाई के बाद निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए प्रेमचंद को बरी कर दिया।

देश की अदालतों में पेंडिंग पड़े हैं 4 करोड़ से ज्यादा मुकदमे

मिलावटी हल्दी केस निपटने में लगा समय अदभुत है लेकिन अद्वितीय नहीं है। इसका कारण यह है कि देश के त्रिस्तरीय न्यायिक सिस्टम में करीब 4 करोड़ मुकदमे पेंडिंग पड़े हैं। सरकारी डाटा के मुताबिक, इसमें से करीब 1.73 लाख केस देश के 25 हाईकोर्ट में 20 साल से पेंडिंग पड़े हैं। इसमें भी करीब आधे केस 30 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग पड़े हैं।

कानूनी दक्षता में पाकिस्तान-सीरिया से भी नीचे है भारत

वर्ल्ड बैंक ने ओवरऑल ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामले में भारत को टॉप तिहाई देशों की रैंक में स्थान दिया है। लेकिन कानूनी दक्षता के मामले में भारत साउथ एशिया देशों में निचले 15% फीसदी देशों में आता है। कानूनी दक्षता के मामले में भारत की स्थिति पाकिस्तान, सीरिया और सेनेगल से भी ज्यादा खराब है।

हल्दी मामला बहुत अविश्वसनीय है: विष्णु वराथन

मिजुहो बैंक ऑफ सिंगापुर में इकोनॉमिक्स एंड स्ट्रैटजी के प्रमुख विष्णु वराथन का कहना है कि यह हल्दी मामला बहुत अविश्वसनीय है। जटिलता और अनावश्यक देरी दर्शाती है कि कैसे भारत न्यायिक व्यवस्था के मामले में चीन जैसे देशों से भी पीछे हैं और अब उन्हें कितना आगे जाना है।

5 साल में 57 फीसदी बढ़ा कंपनियों का कानूनी खर्च

मुकदमों के फैसलों में देरी के कारण भारत में कंपनियों का कानूनी खर्च लगातार बढ़ रहा है। 31 मार्च 2018 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत में लिस्टेड कंपनियों का कानूनी और अनुपालन खर्च बढ़कर 3 बिलियन डॉलर करीब 26 हजार करोड़ रुपए पर पहुंच गया था। पिछले पांच साल में इस खर्च में 57 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। न्यायिक देरी के कारण देश के बड़े कॉरपोरेट प्रभावित हुए हैं। यदि ऐसा ना हो तो देश में कई बड़े सौदे होंगे।

न्यायिक देरी के कारण प्रभावित प्रमुख कारोबारी सौदे

  • आईएचएच हेल्थकेयर ने हॉस्पिटल चेन फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड को टेकओवर करने का प्रयास किया था। लेकिन दायची सैंक्यो कंपनी ने फोर्टिस के प्रमोटर मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह के खिलाफ 500 मिलियन डॉलर के मध्यस्थता समझौते को लागू कराने के लिए मुकदमा दाखिल कर दिया। इस कारण यह सौदा चार साल से अटका पड़ा है।
  • करीब 10 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने टाटा मोटर्स लिमिटेड को आदेश दिया कि वह सरकार से लीज पर ली गई जमीन को किसानों को वापस करे।
  • करीब 22 साल पुराने मामले का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी कंपनियों को 19 बिलियन डॉलर का भुगतान करने का फैसला किया। इस फैसले से ऐसी कंपनियां भी प्रभावित हुईं, जो मुकदमा शुरू होने से पहले ही बंद हो गई थीं।

समाधान में देरी से अनिश्चितता बढ़ती है: सौविक गांगुली

मुंबई की लॉ फर्म एक्यूटी लॉ के मैनेजिंग पार्टनर सौविक गांगुली का कहना है कि समाधान में लंबी देरी विदेशी कंपनियों के लिए अनिश्चितता बढ़ाती है। अन्यथा यह कंपनियां भारत में कारोबार करने की इच्छुक हैं। गांगुली का कहना है कि भारत सिंगापुर, थाइलैंड और अन्य दूसरे देशों से मुकाबला करता है लेकिन यहां पर विवादों का निपटारा काफी तेजी से होता है।

जजों के खाली पड़े पद भी न्याय मिलने में मुसीबत

कोर्ट में खाली पड़े जजों के पद भी समय पर न्याय मिलने में मुसीबत बन रहे हैं। सरकारी डाटा के मुताबिक, 1 अगस्त तक देश के 25 हाईकोर्ट्स में जजों के 37 फीसदी पद खाली पड़े हैं। अधिकांश कमर्शियल मुकदमों की सुनवाई इन्हीं हाईकोर्ट्स में होती है। ताजा डाटा के मुताबिक, लोअर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स में जजों के 23 फीसदी पद खाली पड़े हैं। 2019 में कानून मंत्रालय ने संसद में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में खाली पड़े पदों को भरने के लिए जजों के साथ मिलकर एक कोऑर्डिनेटिंग कमेटी बनाई जा रही है।

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