बासमती जीआई टैग विवाद:इसलिए मध्य प्रदेश से डरा पंजाब, अगर एमपी को जीआई टैग मिलता है तो लगभग 40 फीसदी बासमती अमेरिका और कनाडा जाएगा

          

बासमती उत्पादक राज्य इसलिए चिंतित हैं, क्योंकि मप्र और राजस्थान में उत्पादन बढ़ने के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतें घटी है।

  • इसका सीधा सीधा मतलब है मध्य प्रदेश के किसानों को बासमती धान की बुवाई को रोका जाए
  • पंजाब ने एपीडा को लिखे पत्र में मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान का उल्लेख भी किया है

मध्य प्रदेश के बासमती धान से पहले पाकिस्तान डरा और अब पंजाब खौफ में है। पंजाब राइस मिलर्स एसोसिएशन ने एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) को पत्र लिखकर मप्र में बासमती धान की खेती पर रोक लगाने की मांग की है। जिसमें हवाला दिया गया है कि मप्र में बासमती की पैदावार लगातार बढ़ने से पंजाब के किसानों को नुकसान हो रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। अगर मध्य प्रदेश को बासमती का जीआई टैग मिलता है तो लगभग 40 फीसदी बासमती अमेरिका और कनाडा जाएगा। इससे पंजाब को नुकसान है। क्योंकि वर्तमान में पंजाब इन देशों में बासमती भेज रहा है।

इसका सीधा सीधा मतलब है मध्य प्रदेश के किसानों को बासमती धान की बुवाई को रोका जाए। पंजाब ने एपीडा को लिखे पत्र में मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान का उल्लेख भी किया है। पंजाब सरकार इससे पहले मध्यप्रदेश में अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगाने के लिए केंद्र सरकार से मांग कर चुकी है। पाकिस्तान भी चेन्नई स्थित बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आईपीएबी) में मप्र के खिलाफ याचिका दाखिल कर चुका है।

ये है चिंता का कारण

बासमती उत्पादक राज्य इसलिए चिंतित हैं, क्योंकि मप्र और राजस्थान में उत्पादन बढ़ने के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतें घटी है। जिसका नुकसान ऐसे राज्यों के किसानों को उठाना पड़ रहा है। पंजाब राइस मिलर्स एसोसिएशन ने एपीडा को लिखे पत्र कहा है कि देश में सिर्फ पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू कश्मीर के कठुआ को ही बासमती खेती का अधिकार है।

मप्र में पैदा होने वाले बासमती को मान्यता नहीं

आईपीएबी ने मप्र में पैदा होने वाले बासमती को मान्यता नहीं दी है। इसके बावजूद मप्र के अलावा राजस्थान में पैदा होने वाले चावल का बासमती के नाम पर धड़ल्ले से कारोबार हो रहा है। जिसके कारण पंजाब हरियाणा समेत अन्य बासमती उत्पादक राज्यों के किसानों को घाटा उठाना पड़ रहा है। यदि इसी तरह मप्र का चावल बासमती के नाम पर बाजार में आता रहेगा तो इससे भारतीय बासमती चावल का बाजार बुरी तरह प्रभावित होगा। उनका मानना है कि भारत से बड़ी मात्रा में बासमती चावल खरीद करने वाले देश अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए दूसरे देशों से चावल खरीदना आरंभ कर देंगे।

मप्र के दावे पर कोई फैसला नहीं

बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आईपीएबी) चेन्नई ने मप्र के दावे को पेंडिंग रखते हुए फरवरी 16 में आदेश दिया था कि वर्तमान में जिन सात राज्यों को बासमती चावल उत्पादक माना गया है, उन्हें मिलने वाली सुविधाएं दी जाएं। उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2013 में भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्रार (चेन्नई) ने मप्र के पक्ष में निर्णय दिया था।

  • तब मप्र ने 1908 1913 के ब्रिटिश गजेटियर पेश किये थे, जिसमें बताया था कि गंगा और यमुना के इलाकों के अलावा मध्यप्रदेश के भी कुछ जगहों में भी बासमती पैदा होती रही है। एपीडा ने इसके खिलाफ आईपीएबी में अपील की थी। तब एपीडा ने कहा था कि जम्मू एंड कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के अलावा कहीं भी बासमती चावल का उत्पादन नहीं होता।

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