अशांति कैसे दूर होती है?:एक राजा ने गुरु को हजार स्वर्ण मुद्राएं भेंट कीं और कहा कि मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरा मन शांत हो जाए

 

सुख-सुविधाओं से मन शांत नहीं होता, शांति के लिए इच्छाओं का त्याग करना जरूरी है

जीवन सुखी बना रहे, इसके लिए जरूरी है मन की शांति। अगर मन शांत नहीं रहेगा तो सभी सुविधाओं से भी हमें सुख नहीं मिल सकता है। इस संबंध में एक लोक कथा प्रचलित है। इस कथा में एक राजा ने संत से मन को शांत करने का उपाय पूछा था। जानिए संत ने राजा को कौन सा उपाय बताया...

कथा के अनुसार एक राजा का साम्राज्य बहुत बड़ा था। उसके आसपास के सभी राज्य उसी के अधीन थे। उसके पास सुख-सुविधाओं की कमी नहीं थी। लेकिन, वह हर पल अशांत ही रहता था। राजा को समझ नहीं रहा था कि उसे शांति कैसे मिलेगी।

एक दिन उसके राज्य में एक संत पहुंचे। संत के प्रवचन सुनने और उनके दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग पहुंच रहे थे। संत अपनी अनुभव से सभी लोगों की समस्याएं दूर कर रहे थे। जब ये बात राजा का मालूम हुई तो वह भी संत से मिलने पहुंचा।

राजा अपनी सैनिकों और मंत्रियों के साथ पहुंचा था। उसने संत को एक हजार स्वर्ण मुद्राएं भेंट की और कहा कि गुरुजी मेरे पास सुख-सुविधा की हर एक चीज है। अपार धन-संपदा है। लेकिन मुझे शांति नहीं मिल रही है। कृपया कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा मन शांत हो सके।

संत बहुत विद्वान थे। उन्होंने राजा से कहा कि आप ये मुद्राएं उठा लें, मैं गरीबों से दान नहीं लेता। वहां सभी मंत्री और सैनिक भी थे। संत की ये बात सुनकर सभी हैरान थे। राजा क्रोधित हो गया। उसने कहा कि मैं इस राज्य का राजा हूं। आप मुझे गरीब कैसे कह सकते हैं?

संत ने कहा कि अगर आप राजा हैं तो मेरे पास क्यों आए हैं, मुझसे किस बात का आशीर्वाद चाहिए? राजा ने कहा कि गुरुदेव आपका आशीर्वाद मिल जाएगा तो मैं इस पूरे देश का राजा बन सकता हूं।

संत बोले कि राजन् आपके लालच का अंत नहीं है। आपके पास सबकुछ है, लेकिन अभी भी आप और पाना चाहते हैं। लालच से भरी इच्छाओं की वजह से ही आप और धन-संपत्ति चाहते हैं, तो आप भी गरीब की तरह ही हैं। जब तक मन में लालच रहेगा, तब तक आपका शांत नहीं हो सकता है।

शांति चाहिए तो सबसे पहले आपको लालच छोड़ना होगा। अपनी धन-संपत्ति का उपयोग खुद पर नहीं, प्रजा के सुख के लिए करना होगा, तभी आपको शांति मिल सकती है।

संत की ये बातें सुनकर राजा को अपनी गलती का अहसास हो गया। इसके बाद राजा का स्वभाव बदल गया और वह प्रजा पर अपना धन खर्च करने लगा। प्रजा की खुशहाली देखकर उसका मन भी शांत हो गया।

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