थाॅमस एल. फ्रीडमैन का कॉलम:यूएई, इजरायल और अमेरिका ने दिखाया कि जरूरी नहीं अतीत हमेशा भविष्य को दफनाए और नफरत करने वाले जीतें

 

            तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार

ट्रम्प प्रशासन ने इजरायल द्वारा वेस्ट बैंक पर कब्जा छोड़ने की शर्त पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को इजरायल के साथ सामान्य संबंधों के लिए राजी कर बहुत बड़ा काम किया है। यह डील क्षेत्र के हर बड़े पक्ष को प्रभावित करती है क्योंकि इससे अमेरिका समर्थक, संयत इस्लाम समर्थक, इजरायल के साथ संघर्ष खत्म करने के पक्षकार और ईरान समर्थक, अमेरिका विरोधी, इजरायल के साथ स्थायी संघर्ष के पक्षकार इस्लाम समर्थक, ये सभी अकेले पड़ गए हैं और पीछे छूट गए हैं।

यह भू-राजनैतिक भूकंप है। ऐसा क्यों है, यह जानने के लिए आपको डील को समझना होगा। ट्रम्प की यह शांति योजना जैरेड कुशनर ने बनाई। कुशनर ने मूलत: इजरायल और फिलस्तीन के बीच शांति की कोशिश की, जिसमें इजरायल को वेस्ट बैंक के 30% हिस्से पर कब्जा मिलता और फिलिस्तीनियों को बाकी 70% पर असैनिकीकरण के साथ राज्य स्थापित करने मिलता। फिलिस्तीनियों ने इससे इनकार कर दिया। लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि उनकी योजना के कब्जे वाले हिस्से को 1 जुलाई तक लागू करने की मंशा है, लेकिन वे फिलिस्तीनियों को 70% बाकी हिस्सा देने पर सहमत नहीं हैं।

इस पर बात नहीं बनी क्योंकि कुशनर को मिस्र, जॉर्डन और खाड़ी के अरबों से यह सुनने मिल रहा था कि ऐसा एकपक्षीय इजरायली कब्जा डील तोड़ देगा। कुशनर ने ट्रम्प को मनाया कि वे नेतन्याहू को मर्जी से कब्जा करने से रोकें। इससे नेतन्याहू का जनता में समर्थन कम हो रहा था। इसलिए ट्रम्प, कुशनर, नेतन्याहू और अमीरात के प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायेद ने मुसीबत को फायदे में बदलने का फैसला लिया। वाशिंगटन के लिए पूर्व राजदूत इतामार राबिनोविच कहते हैं, ‘उन्होंने फिलिस्तीनी राज्य के लिए इजरायली कब्जे की जगह, यूएई से शांति के बदले इजरायल द्वारा कब्जा न करने की शर्त रखी। यह शांति के बदले शांति थी, न कि जमीन के बदले शांति।’

यूएई लंबे समय से इजरायल के साथ खुले राजनयिक संबंधों की कोशिश कर रहा था लेकिन यह कब्जे को रोकने की चर्चा ही थी जिसने ऐसी रूपरेखा तैयार की, जहां यूएई को इजरायल के साथ सामान्यीकरण करने पर बदले में फिलिस्तीनियों के लिए भी कुछ मिलता दिख रहा था। दरअसल नेतन्याहू इजरायली दक्षिणपंथी ताकतों को खुश करने के लिए सबकुछ करने का तौयार थे, ताकि वे भ्रष्टाचार के मामले में उनका साथ दें। इस डील को अपनाकर नेतन्याहू ने अपने उन वैचारिक सहयोगियों को नकार दिया है, जिन्हें कब्जे की उम्मीद थी। लेकिन अब नेतन्याहू को मध्य और मध्य-दक्षिणपंथियों पर निर्भर रहना होगा। इस डील की वजह से फिलिस्तीनी प्राधिकरण का नेतृत्व कर रहे महमूद अब्बास भी किसी चीज से वंचित थे, शायद जिसकी वजह से वे बातचीत के लिए आए। वे अपने इस विचार से वंचित हो गए थे कि खाड़ी के अरब, इजरायल के साथ तभी सामान्यीकृत होंगे जब इजरायली फिलिस्तीनी प्राधिकरण की मनपसंद राज्य की मांग पूरी कर देंगे।

इस डील से खाड़ी के अन्य शेख, जैसे बहरीन, ओमान, कतर, कुवैत और सऊदी अरब के शेख भी अमीरात के नक्शे कदम पर चलने को प्रोत्साहित होंगे। वे नहीं चाहेंगे कि यूएई अपनी वित्तीय राजधानी को इजरायल की सायबर टेक्नोलॉजी, कृषि तकनीक और स्वास्थ्य सेवा तकनीक से जोड़ने में उनसे आगे निकल जाए।

तीन अन्य विजेता हैं: 1) जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला। उनका यह डर फिलहाल खत्म हो गया कि इजरायली कब्जा, जॉर्डन को फिलिस्तीनी राज्य में बदलने के प्रयासों को बढ़ावा देगा। 2) अमेरिकी यहूदी समुदाय। अगर इजरायल ने वेस्ट बैंक के हिस्से पर कब्जा कर लिया होता तो इससे अमेरिका का हर यहूदी मंदिर और समुदाय दो हिस्सों में बंट जाता। और 3) जो बाइडेन। अगर बाइडेन ट्रम्प की जगह आते हैं तो उन्हें कब्जे के कष्टकारी मुद्दे की चिंता नहीं करनी होगी। इसमें भू-राजनैतिक रूप से बड़े असफल ईरान और उसके करीबी हैं। ये हैं इराकी नागरिक सेना हिज़बुल्लाह, सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद, हमस, इस्लामी जिहाद, यमन और तुर्की में हाउती। अब तक यूएई को ईरान और इजरायल के बीच संतुलन बनाना पड़ता था। लेकिन यह डील ईरान को सीधा जवाब है: ‘इजरायल अब हमारी तरफ है, इसलिए हमसे मत उलझना।’ लेकिन यहां एक और संदेश है कि यूएई ईरानियों और उसके करीबियों को बता रहा है कि आज इलाके में दो गठबंधन हैं। पहला जो भविष्य के लिए अतीत को दफनाना चाहता है और दूसरा अतीत के लिए भविष्य को दफना रहा है। यूएई पहले का नेता बन गया है और उसने ईरान को दूसरे के नेतृत्व के लिए छोड़ दिया है।

मध्य पूर्व में संप्रदायवाद, भ्रष्टाचार और विविधता का विरोध गहरे तक समाए हैं। लेकिन वहां ऐसे युवा भी हैं जो पुराने खेलों, लड़ाइयों और पुराने घावों से थक चुके हैं। आप उन्हें बेरूत की सड़कों पर अच्छे शासन की मांग करते देख सकते हैं, जिससे उन्हें अपनी क्षमता पहचानने का मौका मिला है। यूएई, इजरायल और अमेरिका ने दिखा दिया है कि जरूरी नहीं है कि अतीत हमेशा भविष्य को दफनाए और नफरत करने वाले, बांटने वाले हमेशा जीतें। उम्मीद है कि यह ताजी हवा एक दिन तेज हवा बनकर पूरे क्षेत्र में फैले। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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