शेखर गुप्ता का कॉलम:भारत के बारे में कमला हैरिस के विचार हमारी अर्थव्यवस्था से तय होंगे; यह सोचना मूर्खता होगी कि उनके भारतीय मूल के होने से बदलाव होगा

 

                  शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘ प्रिन्ट

जो बाइडेन द्वारा कमला हैरिस को अमेरिका के उप-राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाने पर भारत में उत्साह को समझा जा सकता है। हैरिस आधी भारतीय और आधी जमैका मूल की हैं। और आज वे पूरी अमेरिकी हैं। बड़ा सवाल यह है कि अपने भारतीय मूल के कारण वे अपनेमादरे वतनका पक्ष लेंगी या खुद को अमेरिकियों से भी ज्यादा अमेरिकी साबित करने के लिए भारत विरोधी रुख अपनाएंगी? भारतीय मूल से किसी भी तरह जुड़ा कोई व्यक्ति दुनिया में मशहूर होता है, तब हम भारतीय तुरंत दावा करने लगते हैं कि उसका बेहतर हिस्सा हम ही हैं। अगर किसी भी पीढ़ी का कोई भारतीय प्रवासी है, जो शक्तिशाली, अमीर और प्रसिद्ध है, तो वह हमारा है।

हम भारतीय प्रायः ऐसे ही होते हैं। हरगोविंद खुराना को 1968 में जब चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल मिला तब मैं पानीपत के सनातन धर्म हायर सेकेंडरी स्कूल में नौवीं का छात्र था और हमने तुरंत उस पुरस्कार को अपना बता दिया था। हमारे साइंस टीचर ने केवलहरगोविंदको अपना पुराना स्कूली साथी बताया, बल्कि यह भी दावा किया कि वे खुद उनसे बेहतर छात्र थे मगर मजबूरियों के कारण अमेरिका नहीं जा पाए। खुराना 1966 में ही पूर्ण अमेरिकी नागरिक बन चुके थे।

अमेरिकी सार्वजनिक हस्तियों के मामले में हमारी यहभारत समर्थकयाभारत विरोधीवाली सनक ज्यादा तेज हो जाती है। इसलिए केनेडी हमारे सबसे बड़े दोस्त थे, तो निक्सन सबसे बड़े दुश्मन। और बिल क्लिंटन को आप किस खाते में डालेंगे? इसपर हम आगे बात करेंगे।

1980 से 1990 के दशकों के बीच जब अमेरिका के साथ भारत के संबंध कुछ खिंचे-खिंचे से थे तब न्यूयॉर्क के प्रतिनिधि स्टीफन सोलार्ज भारत के साथ बेहतर रिश्ते के सच्चे पैरोकार बनकर उभरे थे। कई लोग मानते थे कि इसके पीछे वहां बसे भारतीय वोटरों में उनका बड़ा आधार था। इसके बाद दिवंगत प्रोफेसर स्टीफन पी. कोहेन ने कहा कि स्टीव सोलार्जभारत समर्थकया कोई औरभारत विरोधीनहीं हैं। वे बस अमेरिका समर्थक हैं। फर्क सिर्फ यह है कि कोई यह मानता है कि भारत के साथ बेहतर रिश्ता अमेरिका के लिए फायदेमंद होगा, तो कोई पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते को अच्छा मानता है।

इसी कसौटी पर हमें आज कमला हैरिस को कसने की जरूरत है। यह सोचना मूर्खतापूर्ण ही होगा कि भारत के बारे में हैरिस के विचार उनके डीएनए से तय होंगे। रिपोर्टरों को हैरिस के किसी भारतीय अंकल के पास इस सवाल के साथ जाने की जरूरत नहीं है कि भारत के प्रति उनका रुख उनके मूल स्थान से तय होगा या मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से?

जब हम हैरिस को एक अमेरिकी मान लेते हैं तब इस विचार को आगे बढ़ा सकते हैं और बिल क्लिंटन पर आते हैं कि वे भारत के लिए अच्छे अमेरिकी राष्ट्रपति थे या नहीं। इसका जवाब है कि वे पहले कार्यकाल में बुरे रहे, तो दूसरे में अच्छे। उनका पहला कार्यकाल तब शुरू हुआ था जब भारत एक लंबे राजनीतिक-आर्थिक संकट से गुजर रहा था। 1989-91 के बीच तीन साल में हमें चौथे प्रधानमंत्री के रूप में पी.वी. नरसिंहराव मिले थे। 1991 में हम कर्ज के लिए आईएमएफ के दरबार में जा खड़े हुए थे। पंजाब में अलगाववादी हिंसा चरम पर थी, कश्मीर उबलने लगा था। राव की सरकार ने पूरे संकल्प के साथ मुक़ाबला किया। पश्चिम के मानवाधिकार समुदाय ने इसका विरोध किया।

क्लिंटन का पहला प्रशासन इसी विवाद के बीच उलझा रहा। इसके साथ ही परमाणु अप्रसार खेमा दबाव डाल रहा था कि भारत परमाणु घेरे से बाहर रहे। इस पर यह व्यापक धारणा भी बनी थी कि 1995 की सर्दियों में राव परमाणु परीक्षण करना चाहते थे मगर क्लिंटन ने उन्हें रोक दिया था। बाद में 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी ने जब परमाणु परीक्षण किया तब क्लिंटन का दूसरा कार्यकाल चल रहा था। 1999 में क्लिंटन ने पाकिस्तान को करगिल में अपनी सीमा में रहने को भी मजबूर किया, इस उपमहाद्वीप का दौरा किया मगर पाकिस्तान में चंद मिनट से ज्यादा नहीं रुके। ये अपने पहले कार्यकाल वाले क्लिंटन नहीं थे। क्लिंटन के दो कार्यकालों में क्या फर्क गया था? फर्क यह आया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था बदल गई थी और दुनिया में अपना रुतबा बना रही थी। राव-मनमोहन के आर्थिक सुधारों की शुरुआत 1991 में हुई। भारत बदल गया था, क्लिंटन वही थे। वे वही कर रहे थे, जो उन्हें अमेरिका के लिए सबसे अच्छा लगता था।

आज के लिए यही सबक है। भारत को अगर दुनिया की शक्तिशाली राजधानियों में अपना रुतबा और अपनी इज्ज़त बढ़ानी है, तो उसे अपनी अर्थव्यवस्था, आंतरिक समरसता और बाह्य सुरक्षा पर ध्यान देना होगा। पिछले तीन साल में हमारा देश इन तीनों मामलों में फिसलकर पीछे चला गया है। मोदी सरकार के चहेते यह नहीं मानेंगे, लेकिन इतना तो वे मानेंगे ही कि पिछले तीन साल में हमारी अर्थव्यवस्था लस्तपस्त हो चुकी है। अगली जनवरी में इसकी जो भी हालत रहेगी, भारत के बारे में कमला हैरिस के विचार उसी से तय होंगे, कि उनके वंशाणु से। वह भी तब, जब बाइडेन का टिकट जीतता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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