चीन-पाकिस्तान बना रहे जैविक हथियार:दोनों देशों के बीच बन रहे कॉरिडोर की आड़ में वायरस पर रिसर्च हो रही, वुहान इंस्टीट्यूट को मिली जिम्मेदारी; ऑस्ट्रेलिया वेबसाइट का दावा

 

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के वैज्ञानिक पाकिस्तान में 2015 से खतरनाक वायरस पर रिसर्च कर रहे हैं। -सिम्बॉलिक इमेज

  • ऑस्ट्रेलिया की वेबसाइट क्लाक्सोन ने दावा किया है कि यह रिसर्च 5 साल से चल रही है
  • वेबसाइट के मुताबिक चीन-पाकिस्तान में इस रिसर्च को लेकर एक सीक्रेट डील हुई

चीन और पाकिस्तान मिलकर घातक जैविक हथियार तैयार कर रहे हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) की आड़ में इसे अंजाम दिया जा रहा है। यह काम पिछले पांच सालों से चल रहा है। कोरोना वायरस के बाद चर्चा में आए वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वॉयरोलॉजी को काम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऑस्ट्रेलिया की वेबसाइट क्लाक्सोन ने यह दावा किया है।

वेबसाइट ने ये 7 दावे किए

  • एंथनी क्लान की रिपोर्ट के मुताबिक, वुहान के वैज्ञानिक पाकिस्तान में 2015 से खतरनाक वायरस पर रिसर्च कर रहे हैं।
  • क्लाक्सोन ने पिछले महीने यह भी खुलासा किया था कि चीन और पाकिस्तान ने बॉयो-वारफेयर की क्षमता को बढ़ाने के लिए तीन साल की एक और सीक्रेट डील की है।
  • दोनों देशों के वैज्ञानिकों की स्टडी रिसर्च पेपर में भी छपी है।
  • यह रिसर्च दिसंबर 2017 से लेकर इस साल मार्च तक की गई। इसमें 'जूनोटिक पैथाजंस (जानवरों से इंसानों में आने वाले वायरस)' की पहचान और लक्षणों के बारे में बताया गया है।
  • एक रिसर्च में पाकिस्तान ने वुहान इंस्टीट्यूट को वायरस संक्रमित सेल्स मुहैया कराने के लिए शुक्रिया भी कहा था। इसके साथ ही रिसर्च को CPEC के तहत मिले सहयोग का भी जिक्र किया गया है।
  • रिसर्च में वेस्ट नील वायरस, मर्स-कोरोनावायरस, क्रीमिया-कॉन्गो हेमोरजिक फीवर वायरस, थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम वायरस और चिकनगुनिया पर भी प्रयोग किए गए हैं।
  • रिपोर्ट के मुताबिक रिसर्च के लिए हजारों पाकिस्तानी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का ब्लड सैम्पल लिया गया। इनमें वे लोग शामिल थे जो जानवरों के साथ काम करते थे और दूरदराज के इलाकों में रहते थे।

संक्रमक बीमारियों की आड़ में बनाए जा रहे हथियार

ऑस्ट्रेलियाई वेबसाइट का कहना है कि चीन और पाकिस्तान के बीच एक समझौता किया गया है। इसके चलते दोनों देश संक्रामक बीमारियों पर शोध कर रहे हैं। हालांकि, इसकी आड़ में जैविक हथियारों के लिए रिसर्च की जा रही है। फिलहान इन वायरस से बचने की कोई वैक्सीन या सटीक इलाज नहीं है। इनमें से कुछ को दुनिया के सबसे घातक और संक्रामक वायरस माना जाता है।

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